नाला, नौटंकी और ‘कॉकरोच क्रांति’

निर्भय यादव ब्यूरो मथुरा

 

आजकल समाजसेवा कम और “सोशल मीडिया सेवा” ज्यादा चल रही है। जिस दौर में कुछ लोग वर्षों तक चुपचाप समाज के लिए काम करते रहते हैं और किसी को भनक तक नहीं लगती, उसी दौर में कुछ नए जमाने के “वायरल वीर” कैमरा ऑन होते ही सीधे नाले में छलांग लगा देते हैं।

 

ताजा मामला मथुरा-वृंदावन का है, जहां चित्र में दिखाई दे रहे युवक दीपक शर्मा एक बार फिर चर्चा में हैं। कल तक नगर निगम कार्यालय में कॉकरोच की वेशभूषा पहनकर प्रदर्शन कर मीडिया की सुर्खियां बटोरने वाले दीपक शर्मा आज वृंदावन के एक गंदे नाले में उतर गए। कैमरा चालू था, वीडियो बन रहा था, और सोशल मीडिया पर “एक और वायरल कंटेंट” तैयार हो रहा था।

 

अब सवाल यह नहीं कि नाला गंदा है या सफाई व्यवस्था पर सवाल क्यों हैं — सवाल यह है कि क्या समाजसेवा का मतलब अपनी जान जोखिम में डालकर कैमरे के सामने स्टंट करना रह गया है?

 

नाले में जहरीली गैस हो सकती है, करंट फैल सकता है, फिसलन से हादसा हो सकता है, संक्रमण का खतरा अलग। यदि कोई दुर्घटना हो जाती तो अगली सुबह यही कहा जाता कि “प्रशासन की लापरवाही ने जान ले ली।” यानी जोखिम खुद लिया जाए और जिम्मेदारी सीधे प्रशासन के सिर डाल दी जाए — यह नया ट्रेंड तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है।

 

विडंबना देखिए, कुछ लोग ऐसे हर प्रदर्शन को “क्रांतिकारी समाजसेवा” घोषित कर देते हैं। सोशल मीडिया पर दो वीडियो वायरल होते ही व्यक्ति को ऐसा पेश किया जाता है मानो उसने अकेले व्यवस्था परिवर्तन का ठेका ले लिया हो। वहीं दूसरी ओर कई लोग इसे केवल सस्ती लोकप्रियता पाने का तरीका बता रहे हैं। शहर की गलियों में चर्चा यह भी है कि भीषण गर्मी में कुछ लोगों का उत्साह सामान्य सीमा से ज्यादा उफान मार रहा है।

 

हालांकि यह भी सच है कि यमुना प्रदूषण, गंदे नाले और सफाई व्यवस्था जैसे मुद्दे गंभीर हैं और उन पर आवाज उठना जरूरी है। लेकिन आवाज उठाने और सनसनी पैदा करने में फर्क होता है। समाजसेवा का अर्थ कैमरे के सामने जोखिम भरे प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि समस्या के स्थायी समाधान के लिए जनजागरण, संवाद और जिम्मेदार प्रयास करना होता है।

 

आज जरूरत इस बात की है कि सोशल मीडिया की “वायरल संस्कृति” और वास्तविक जनहित के बीच का अंतर समझा जाए। क्योंकि हर वायरल वीडियो समाजसेवा नहीं होता, और हर नाले में उतरने वाला व्यक्ति समाज सुधारक भी नहीं कहलाता।

 

कहीं ऐसा न हो कि सुर्खियों में बने रहने की यह दौड़ किसी दिन बड़ी दुर्घटना में बदल जाए — और फिर पूरा शहर केवल तमाशा देखता रह जाए।

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