नारद मोह व रावण जन्म की लीला का हुआ भावुक मंचन

यज्ञदत्त चतुर्वेदी मथुरा

 

विचरण करते हुए देवर्षि नारद हिमालय कन्दराओं में भागीरथी नदी के तट पर भगवान नारायण का स्मरण करते हुए समाधि में लीन हो गये ।

उनके समाधिस्थ होने पर देव राज इन्द्र का सिंहासन हिलने लगा । इन्द्र गुरू ब्रहस्पति के पास पहुंचा और कारण जानना चाहा । बृहस्पति ने योंग ध्यान से देख कर बताया कि देवर्षि नारद हिमालय की कन्दराओं में कठिन तपस्या कर रहे हैं । इन्द्र को भ्रम हुआ कि कहीं नारदजी मेरा सिंहासन चाहते हैं । इन्द्र ने कामदेव को रम्भा आदि अप्सराओं सहित तप भंग करने के लिए भेजा । अप्सराओं के कला-कौशल व कन्दुक-क्रीड़ा से भी तप भंग नहीं हुआ तो कामदेव ने स्वयं कुसुम बांण का प्रयोग किया वह भी व्यर्थ चला गया ।

कामदेव त्राहिमाम कहते हुए शरणागत हो जाता है । नारदजी ने नेत्र खोले तो कामदेव ने किये अपराध की क्षमा मांगी । और कहा कि देवराज इंद्र तनिक भी भयभीत न हों । नारदजी को अभिमान हो गया कि उन्होंने काम को ही नहीं बल्कि क्रोध को भी जीत लिया, शिव भी क्रोध को नहीं जीत सके । इसी कारण उन्होंने कामदेव को भस्म किया ।

शंकर भगवान के समक्ष पहुच कर काम व क्रोध विजय की कथा सुनाई । शंकर जी ने कहा कि यह प्रसंग जो तुमने मुझे सुनाया है भगवान विष्णु को नहीं बताना । ब्रह्माजी ने भी शिव की बात का समर्थन किया ।

प्रसन्नता के साथ उन्होंने भगवान विष्णु भगवान को प्रसंग सुनाया तो श्री विष्णु जान गये कि नारद के हृदय में भयंकर अभिमान रूपी वृक्ष का अंकुर उदय हो चुका है । इनका अभिमान समाप्त करना परम आवश्यक है ।

भगवान विष्णु की आज्ञा से योग माया ने श्री नगर नाम का नगर बनाया । जिसके राजा शील निधि की पुत्री विश्व मोहिनी का स्वयंवर हो रहा है । विचरण करते हुए नारद शील निधि से मिले । शील निधि ने पुत्री की हस्तरेखा देवर्षि को दिखायीं । देवर्षि विश्व मोहिनी के सौन्दर्य पर मुग्ध हो गये । विवाह की इच्छा उनके मन में जागृत हुई । उन्होंने सोचा कि संसार में श्रीविष्णु से सुन्दर कोई नहीं है । इसलिए यह सुन्दरता उन्हीं से मांगनी चाहिए । उन्होंने भगवान से प्रार्थना कर इच्छा प्रकट की कहा हरि आप मुझे अपना रूप प्रदान करें । उन्होंने उन्हें हरि (बन्दर) का मुख प्रदान कर दिया । स्वयं वर में विश्वमोहिनी ने श्रीविष्णु के वरमाला डाल कर वरण कर लिया ।

नारद क्रोधित हो गए और श्रीविष्णु को श्राप दिया कि आपने मुझे बंदर बना दिया लेकिन मनुष्य योनि में ये बन्दर ही आपकी सहायता करेंगे एवं मुझे पत्नी मिलने में बाधक बन कर जो अपमान किया है आप को भी पत्नी विरह में दुखी होकर भारी दुख व कष्ट झेलने पड़ेंगे तथा शंम्भूगणों को निशाचर होने का श्राप दे दिया । तत्पश्चात माया का पर्दा हटने पर नारदजी विष्णुजी से क्षमा मांगते हैं और शम्भूगणों को भी उनकी मुक्ति का मार्ग बताकर चले जाते हैं ।

राजामनु अपने पुत्र उत्तानपाद को राज्य का भार सोंप कर अपनी रानी के सहित वन में तप करते हैं । जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु, शिव प्रकट होकर विष्णुजी को श्रीराम के रूप में उनके वंश में अवतार धारण करने का वरदान देते हैं ।

रावण, कुम्भकरण, विभीषण का भी जन्म होता है । रावण अपने बाहुबल से देवलोक पर विजय प्राप्त करता है तथा मयदानव की पुत्री मंदोदरी से अपना विवाह करता है ।

प्रसाद व्यवस्था चौ. त्रिलोकीनाथ, चौ.राकेशकुमार सर्राफ ने की ।

लीला में सभा के नीति निदेशक गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी, सभापति जयन्ती प्रसाद अग्रवाल, उपसभापति जुगलकिशोर अग्रवाल, महामन्त्री मूलचन्द गर्ग, मन्त्री प्रदीप सर्राफ पी.के., विजय सर्राफ किरोड़ी, कोषाध्यक्ष शैलेश अग्रवाल सर्राफ,नागेंद्र मोहन मित्तल पं0 शशांक पाठक, दिनेशचन्द अग्रवाल सदर, विजय गोयल, अंशुल गर्ग, मनोज अग्रवाल सुरेन्द्र खौना, चौ. सुरेशचन्द, राजेश चौधरी , संजय बिजली ,अनूप टेंट ,विनोद सर्राफ ,अजय अग्रवाल,राजनारायण गौड, राजीव शर्मा, अंकुर गर्ग, हेमन्त अग्रवाल, योगेश गोयल, नवीन चौधरी, मोहित अग्रवाल, तेजस अग्रवाल, वैभव अग्रवाल, चरतलाल सर्राफ, मुरारी लाल गर्ग ,आदि प्रमुख थे ।

18 सितम्बरको आकाशवाणी की लीला सायं 5 बजे असकुण्डा बाजार में तथा रामजन्म, बधाई गायन की लीला व छप्पन भोग के विशेष दर्शन रात्रि 7 बजे श्रीकृष्ण जन्मस्थान लीला मंच पर होंगे ।

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