रामसे ब्रदर्स के पतन की कहानी:

विशाल गुप्ता प्रधान संपादक

दोस्तों आज बात करते हैं रामसे ब्रदरस की.. 80 और 90 के दशक में कोई भी ऐसा सिनेमा प्रेमी नहीं होता था जिसने रामसे ब्रदरस का नाम ना सुना हो या उनके द्वारा बनाई गई बेहतरीन डरावनी फिल्में न देखी हो.. दरअसल रामसे ब्रदर्सस भारत में हॉरर फिल्मों बनाने वाले जनक मतलब जननी के तौर पर माने जाते हैं.. उन्होंने 1970 से लेकर 80 के दशक में कई कम बजट वाली लेकिन बेहद लोकप्रिय हॉरर फिल्में बनाई थी.. एक समय पर उनका ही समय था..लेकिन दर्शकों को यह नहीं पता होगा कि एक समय रामसे फैमिली पर ऐसा भी आया था जब वह पूरी तरह से कंगाल हो चुके थे और अगर समय उनके साथ ना देता और उनके द्वारा बनाई गई फिल्म का एक सीन हिट ना हुआ होता तो कभी भी रामसे ब्रदर्स उस दोर की इतनी डरावनी फिल्में कभी ना बन सकते.. आज रामसे ब्रदरस की उन फिल्मों और रामसे ब्रदर्स के जीवन पर एक नजर डालेंगे #सोनी_सिंह_गिल

सबसे पहले आपको बताना जरूरी है कि राम से ब्रदर्स ने दो गज जमीन के नीचे 1972 फिल्म से बॉलीवुड में हॉरर फिल्मों का चलन शुरू किया था ..यह फिल्म उनकी पहली बड़ी हॉरर हिट फिल्म साबित हुई थी..

उसके बाद दरवाजा 1978, होटल 1981, पुराना मंदिर 1984, तहखाना 1986, डाक बंगला 1987, वीराना 1988, पुरानी हवेली 1989, बंद दरवाजा 1990 और महाकाल 1993 जैसी फ़िल्में दर्शकों के रूबरू करी थी

दर्शकों को शायद नहीं पता होगा कि रामसे ब्रदरस का असली नाम पारिवारिक नाम “राम सिंघानी” था.. देश के विभाजन से पहले वह सिंधी हिंदू परिवार कराची और लाहौर जो पाकिस्तान में है वहां पर रहते थे ..वहां वे राम सिंह रेडियो एंड इलेक्ट्रॉनिक कंपनी नाम से इलेक्ट्रोंस की दुकाने चलाते थे.. उनका रामसे नाम कैसे पड़ा.. उसकी भी एक कहानी है, दरअसल उनके पिता का नाम फतेहचंद यू. राम सिंघानी था.. वहां पर ब्रिटिश अधिकारी और ग्राहकों को राम सिंघानी नाम बोलने से कठिनाई होती थी.. इसीलिए उन्होंने उन्हें मिस्टर रामसे कहना शुरू कर दिया था, जो बाद में उनके आधिकारिक सरनेम बन गया

1947 में भारत के विभाजन के बाद दंगों के डर से पूरा परिवार सब कुछ छोड़कर मुंबई आ गया.. उन्होंने मुंबई के लेमिंगटन रोड पर फिर से एक छोटी सी इलेक्ट्रॉनिक की दुकाने शुरू कर दी

रामसे ब्रदर्स एक सात भाइयों की अनोखी टीम थी फतेहचंद रामसे के सात बेटे हुए ..फिल्मों में आने के बाद सातों भाइयों ने अपनी एक ऐसी टीम बनाई जहां बाहरी किसी बड़े करू की जरूरत नहीं पड़ती थी.. उन्होंने फिल्म निर्माण के विभागों को कुछ आपस में इस तरह से बाटा था

कुमार राम से जो सबसे बड़े भाई थे, वह स्क्रिप्ट कहानी और स्क्रीन प्ले लेखन का काम किया करते थे

तुलसी रामसे निर्देशन संभालते थे

श्याम रामसे निर्देशन और संपादन संभाला करते थे

गंगू रामसे सिनेमैटोग्राफी और कैमरा वर्क किया करते थे

केशु रामसे ने फिल्म निर्माण और प्रोडक्शन मैनेजमेंट का काम संभाल

अर्जुन रामसे पोस्ट प्रोडक्शन और एडिटिंग के काम में जुट गए और किरण रामसे साउंड रिकॉर्डिंग और साउंड इफेक्ट दिया करते थे

लेकिन ये कभी ना हो पाता क्योंकि उनके पिता से पहले एक बहुत बड़ी गलती हो गई थी मतलब पिता फतेह चंद रामसे ने एक गलती कर दी थी ..ग्लैमर की दुनिया से आकर्षित होकर पिता फतेह चंद ने फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन और निर्माण में अपना सारा पैसा लगा दिया.. उन्होंने शुरुआती दौर में ही शहीद ए आजम भगत सिंह 1954, रुस्तम सोहराब 1963, और एक नन्ही मुन्नी लड़की थी 1970, जैसी मुख्य धारा की फिल्में बना डाली ..दुर्भाग्यश्य यह सभी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप रही और रामसे परिवार पर भारी कर्ज चढ़ गया पूरा परिवार भारी कर्ज में डूब गया

लेकिन रामसे ब्रदरस के इतने नेगेटिव समय में कुछ पॉजिटिव भी हो गया ..फिल्म “एक नन्ही मुन्नी लड़की थी” भले ही फ्लॉप साबित हुई थी ..लेकिन उस फिल्म के एक सीन ने रामसे भाइयों की किस्मत बदल कर रख दी.. उस फिल्म के एक दृश्य में मशहूर अभिनेता पृथ्वीराज कपूर चोरों को डराने के लिए एक भयानक शैतानी मुखौटा पहनते हैं ..सभी ने यह नोटिस किया के थिएटर में जब भी वह सीन आता था तो दर्शक डर जाते थे और तालियां बजाने लगते थे.. श्याम और तुलसीराम ने यह पहचान लिया के भारतीय दर्शकों को डरना पसंद है.. उसमें उन्हें मजा आता है और उस समय भारत में कोई भी प्योर हॉरर फिल्में भी नहीं बना रहा था ..रामसे ब्रदर के हॉरर फिल्मी सफर और उनकी पारिवारिक विरासत को बचाने के लिए उन्हें एक रास्ता दिखाई देने लगा

उन्होंने साल 1972 में अपनी पहली शुद्ध हॉरर फिल्म “दो गज जमीन के नीचे” बना डाली.. यह फिल्म भारतीय सिनेमा के लिए एक केस स्टडी फिल्म बन गई.. क्योंकि यह फिल्म मात्र 3:50 लख रुपए के बजट में सिर्फ 40 दिनों में बनकर तैयार हो गई थी ..इस फिल्म की शूटिंग के लिए सातों भाई और महज़ 15 लोगों का करू महाबलेश्वर के एक सरकारी गेस्ट हाउस में रुका था.. जिसका किराया उस दौर में ₹500 प्रतिदिन होता था.. अभिनेताओं के लिए कोई स्पेशल कॉस्ट्यूम नहीं खरीदे गए थे.. वह अपने खुद के कपड़े पहनकर ही आया करते थे.. इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 45 लख रुपए से ज्यादा की कमाई कर डाली और यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई.. इस फिल्म के बाद राम से ब्रदर्स ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अगले दो दशकों में पुराना मंदिर 1984, वीराना 1988, और पुरानी हवेली 1989 जैसी 30 से अधिक बैक टू बैक सफल हॉरर फिल्में बना डाली

रामसे फिल्मों की एक खास बात होती थी.. उनकी फिल्मों का एक बेहद सफल फार्मूला माना जाता था.. जहां सातों भाई तकनीकी काम संभालते थे.. वहीं परिवार की महिलाएं सेट पर पूरी कास्ट और क्रू के लिए खाना बनाया करती थी जिसकी वजह से लागत बहुत कम हो जाती थी

फिल्मों में डरावनी मॉन्सटर्स जैसे समरी, पुरानी हवेलियां, चमगादड़, कब्रिस्तानों के साथ-साथ भरपूर थ्रिलर ग्लैमर बोल्ड सीनस और करणप्रिय संगीत का तड़का भी लगाया जाता था और हमेशा नए कलाकारों को भी मौका दिया जाता था.. वह बड़े सितारों के बजाय नए या बी ग्रेड कलाकारों जैसे की आरती गुप्ता, हेमंत बिरजे, जैस्मिन को साइन किया जाता था ..ताकि बजट नियंत्रण में रहे और सिर्फ कंटेंट पर ही फोकस रखा जाता था

लेकिन इतने बड़े परिवार और इतनी बड़ी विरासत का अंत भी एक दिन हो ही गया.. 1990 के दशक के उत्तरार्ध में तकनीक के आधुनिक होने और बॉलीवुड फिल्मों के भारत में पैर पसारने और बड़े बैनर जैसे के रामगोपाल वर्मा की फिल्म “रात” और फिल्म “भूत” द्वारा हॉरर फिल्में बनाने के कारण रामसे ब्रदर का पारंपरिक जादू कम होने लगा.. हालांकि उन्होंने टेलीविजन पर “दा ज़ी हॉरर शो 1993” बनाकर भारतीय टीवी इतिहास का सबसे सफल हॉरर शो भी दिया ..लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ सातों भाइयों का निधन हो गया.. तुलसीरामसे का 2018 में निधन हुआ , श्याम रामसे का 2019 में और कुमार रामसे का निधन 2021 में हुआ .. हालांकि आज भी उनकी तीसरी पीढ़ी के बच्चे जैसे दीपक रामसे और अमित रामसे इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं ..हालांकि परिवार के अन्य सदस्य अब अलग-अलग व्यवस्थाओं में चले गए हैं ..लेकिन बॉलीवुड अभिनेता और निर्माता अजय देवगन ने रामसे ब्रदर्स के इसी अनोखे और संघर्षपूर्ण जीवन पर एक बायोग्राफी फिल्म बनाने के अधिकार मतलब राइट्स भी खरीद रखे हैं

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