“अगवानी की राजनीति: प्रोटोकॉल, प्रतिष्ठा और संदेशों के बीच”

निर्भय यादव ब्यूरो मथुरा

 

देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन राष्ट्रपति का किसी भी राज्य या शहर में आगमन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं होता, बल्कि वह शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता, प्रोटोकॉल की समझ और राजनीतिक संस्कारों की भी परीक्षा बन जाता है।

 

मथुरा में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हालिया दौरे के दौरान स्वागत में प्रदेश के वरिष्ठ मंत्रियों और प्रशासनिक अमले की सक्रिय मौजूदगी ने एक बार फिर इस प्रश्न को जीवंत कर दिया है कि “अगवानी” आखिर केवल प्रोटोकॉल है या फिर एक सियासी संदेश भी?

 

याद किया जाए तो पूर्व में इसी मथुरा दौरे के दौरान स्वागत की तस्वीरें कुछ अलग थीं—सीमित उपस्थिति, कम सक्रियता और औपचारिकता का भाव अधिक। लेकिन इस बार दृश्य बदला हुआ नजर आया। पूरा प्रशासनिक ढांचा मुस्तैद, जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी और स्वागत में दिखी तत्परता—यह बदलाव अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।

 

हाल के समय में देश के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्रपति के कार्यक्रमों को लेकर प्रोटोकॉल और सम्मान के मुद्दे चर्चा में रहे हैं। कहीं उपस्थिति को लेकर सवाल उठे, तो कहीं अनुपस्थिति ने बहस को जन्म दिया। ऐसे में मथुरा का यह दृश्य केवल एक स्वागत समारोह नहीं, बल्कि एक “संदेश” की तरह भी देखा जा रहा है—जहां कोई भी पक्ष अब लापरवाही का जोखिम नहीं लेना चाहता।

 

व्यंग्य यही कहता है कि हमारे यहां कभी-कभी “सम्मान” भी परिस्थितियों के हिसाब से अपना रूप बदल लेता है। जब बहस तेज होती है, तो प्रोटोकॉल और अधिक “सख्त” हो जाता है; जब सवाल उठते हैं, तो व्यवस्थाएं और “चुस्त” दिखने लगती हैं।

 

परंतु मूल प्रश्न वहीं का वहीं है—क्या सम्मान परिस्थितियों का मोहताज होना चाहिए? क्या संवैधानिक पदों के प्रति आदर केवल तब दिखना चाहिए जब उस पर चर्चा हो रही हो?

 

लोकतंत्र में मर्यादा और प्रोटोकॉल का पालन किसी दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि स्वभाव का हिस्सा होना चाहिए। यदि ऐसा हो, तो न तो किसी को उपस्थिति सिद्ध करने की जरूरत पड़ेगी और न ही अनुपस्थिति पर बहस होगी।

 

अगवानी में खड़े लोग बदल सकते हैं, लेकिन सम्मान की भावना स्थिर रहनी चाहिए—क्योंकि यह किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि संविधान का सम्मान होता है।

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