अमर शहीद राव राजा तुला सिंह बहादुर का जन्म दिवस पूरे अहीरवाल क्षेत्र में बहुत धूमधाम से मनाया गया

शिव कुमार यादव ब्यूरो चीफ रेवाड़ी।

*9 दिसंबर रेवाड़ी।*

अहीरवाल रत्न रेवाड़ी रियासत के क्षत्रिय यदुवँशी अहीर शासक अमर शहीद राव राजा तुलासिंह बहादुर वह शख्सयित थे, जिन्होंने आजादी के पहले स्वाधीनता संग्राम मे सबसे अहम योगदान दिया था। उनके जन्मदिवस पर अहीरवाल क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए गए। आइए आपको राव तुलाराम के बारे में संक्षिप्त रूप से बताते हैं।

राव राजा तुलासिंह जी बहादुर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं में से एक थे।

उन्हें हरियाणा राज्य मे ” राज नायक” माना जाता है। विद्रोह काल मे, हरियाणा के दक्षिण-पश्चिम इलाके से सम्पूर्ण बिटिश हुकूमत को अस्थायी रूप से उखाड़ फेंकने तथा दिल्ली के ऐतिहासिक शहर मे विद्रोही सैनिको की, सैन्य बल, धन व युद्ध सामाग्री से सहायता प्रदान करने का श्रेय राव राजा तुलासिंह जी को जाता है।

राव राजा तुला सिंह का जन्म 9 दिसंबर 1825 मे अहीरवाल प्रान्त के लंदन कहे जाने वाले रेवाड़ी जिले में भगवान कृष्ण के वंशज आफरिया गोत्र के चंद्रवंशी अहीर राज-घराने में हुआ था। इनके पिताजी का नाम राव राजा पूर्ण सिंह था एवम माता का नाम ज्ञान कौर था।

राव तुलासिंह की शिक्षा तब शुरू हुई जब वो पांच साल के थे। साथ-साथ ही उन्हें शस्त्र चलाने और घुड़सवारी की शिक्षा भी दी जा रही थी। राव तुला सिंह जब 14 साल के थे तब उनके पिता राव राजा पूर्ण सिंह जी का निधन हो गया और 14 दिनों बाद उन्हें रेवाड़ी का भावी राजा बनाया गया।

राव राजा तुला सिंह का राज्य कनीना, बवाल, फरुखनगर, गुड़गांव, फरीदाबाद, होडल और फिरोजपुर झिरका तक फैला हुआ था

राव राजा तुलाराम अंग्रेजों के शासन से काफी परेशान थे और उनके दिल में आक्रोश की भट्टी सुलग रही थी.

उस समय देश पर अंग्रेजों का कब्ज़ा था और जब एक 14 साल का बच्चा राज गद्दी पर बैठा हो तो इस बात को अंग्रेज एक मौके रूप में देखते थे।

अंग्रेज चाहते थे कि वह इस प्रांत को अपनी सीमा के अन्दर ले लें ।

जब 1857 की क्रांति की शुरुआत हुई तो राव राजा तुला सिंह भी इस आग में कूद पड़े। पुस्तकें बताती हैं कि मेरठ से शुरू हुई इस लड़ाई में राव राजा तुलासिंह और उनके प्रधान सेनापति राव गोपालदेव सिंह जो उनके चचेरे भाई थे, दोनों शूरमे शामिल थे।

एक तरफ अंग्रेजी हुकूमत भारतीय सिपाहियों को मार रही थी क्योंकि वह कारतूस का प्रयोग नहीं कर रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ राव तुला सिंह जी और राव गोपाल देव सिंह जी जैसे वीर योद्धा अंग्रेजों की नाक में दम कर रहे थे। मेरठ में इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को दम चखाकर, दिल्ली की और रास्ता लिया। जहां बीच में कुछ 600 लोगों को भी जेल से छुड़ा लिया गया था। दिल्ली में जो लड़ाई लड़ी गयी थी उस जगह अंग्रेजी सेना में भगदड़ की भी ख़बरें लिखी हुई हैं।

इस के बाद अहीरवाल नरेश राव राजा तुलासिंह को लगा कि अब अपने प्रांत में चलकर अंग्रेजों को वहां से भगाया जाये।

17 मई, 1857 को 500 यदुवँशी रणवीरों की सेना ने तहसील मुख्यालय पर धावा बोल दिया।

तहसीलदार तथा थानेदार को बाहर निकल कर तहसील के खजाने और सरकारी दफ्तरों आदि पर पूर्ण रूप से कब्ज़ा कर लिया।

राव राजा तुलासिंह ने अंग्रेज़ो की स्वाधीनता को ठोकर मार कर रेवाड़ी को स्वतंत्र रियासत घोषित किया।

रेवाड़ी रियासत को अपने अधीन करने के लिए अंग्रेजों ने निरंतर हमले किये।

अंग्रेज अब यह समझ चुके थे कि राजा तुला सिंह पर काबू पाए बिना वे चैन से दिल्ली पर शासन नहीं कर सकते । इसलिए राजा राव तुलासिंह को तहस-नहस करने के लिए 2 अक्टूबर 1857 को ब्रिगेडियर जनरल शोबर्स एक भारी सेना तोपखाने सहित लेकर रेवाड़ी की ओर बढ़े तथा 5 अक्टूबर 1857 को पटौदी में उनकी झड़प राव तुलाराम की एक सैनिक टुकड़ी से हुई. अंग्रेज राव तुलाराम की सैनिक तैयारी को देखकर दंग रह गए,यह विदेशी लश्कर एक माह तक राव तुलाराम को घेरे में लेने की कोशिश करता रहा।

अंग्रेजों ने दस नवम्बर 1857 को एक बड़ी सेना जबरदस्त तोपखाने के साथ कर्नल जैराल्ड की कमान में रेवाड़ी की सेना के खिलाफ रवाना की।

16 नवम्बर 1857 को जैसे ही अंग्रेजी सेना नसीबपुर के मैदान के पास पहुंची राव राजा तुलासिंह और उनके यादव वीर अंग्रेज़ो की सेना उन पर टूट पड़ी। यह आक्रमण बड़ा भयंकर था कि अंग्रेजी सेना के छक्के छूट गए।उनके कमाण्डर जैराल्ड सहित अनेक अफसर मारे गए राव राजा तुलासिंह की फौज बड़ी वीरता से लड़ी जिसकी दुश्मनों ने भी तारीफ की। नसीबपुर मे हुए युद्ध में राव राजा तुला सिंह की सेना को बहुत क्षति पहुंची जिसके बाद वह सहायता लेने के लिए रूस, अफगानिस्तान आदि देश के शासकों के पास गए।

जब राव राजा तुला सिंह को झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु का पता लगा तो उन्हें गहरा धक्का लगा और भारत को आजाद कराने की तड़प लिए 23 सितम्बर 1863 को भारत माता का एक शूरवीर पुत्र काबुल में स्वर्ग सिधार गया ।

वहां उनका शाही सम्मान के साथ दाह संस्कार कर दिया गया और अस्थियां सम्मान के साथ रेवाड़ी राजघराने को सौंप दी गईं।

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