पत्रकार और 2 जून की रोटी पर हमारी खास खबर

“कलम की धार तेज होती है, लेकिन अक्सर उसकी थाली खाली रह जाती है।”
समाज में पत्रकार को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। वह सत्ता के गलियारों से लेकर गांव की पगडंडियों तक सच की तलाश में भटकता है। कभी भीषण गर्मी में, कभी मूसलाधार बारिश में और कभी कड़ाके की ठंड में वह खबरों के पीछे दौड़ता रहता है। लेकिन विडंबना यह है कि जो व्यक्ति समाज की समस्याओं को उजागर करता है, वही अक्सर अपनी रोज़मर्रा की समस्याओं से जूझता रहता है।
कहावत है, “घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध।” पत्रकार की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। समाज उसकी खबरों पर बहस करता है, नेता उसकी मौजूदगी को महत्व देते हैं, अधिकारी उसकी कलम से डरते हैं, लेकिन जब उसके संघर्षों की बात आती है तो शायद ही कोई उसकी ओर देखता है।
सुबह की पहली किरण के साथ शुरू होने वाली उसकी भागदौड़ रात के अंतिम पहर तक चलती है। किसी दुर्घटना की सूचना मिले तो भोजन छोड़कर दौड़ पड़ता है। किसी गरीब की फरियाद सुनाई दे तो उसकी आवाज़ बनने की कोशिश करता है। किसी भ्रष्टाचार का मामला सामने आए तो जोखिम उठाकर सच्चाई सामने लाता है। लेकिन महीने के अंत में जब घर का बजट बनता है तो उसे भी “दो जून की रोटी” की चिंता सताती है।
लोकोक्ति है, “जिस तन लागे सो तन जाने।” पत्रकारिता के आकर्षक चेहरे के पीछे छिपी कठिनाइयों को वही समझ सकता है जो इस पेशे से जुड़ा हो। लोगों को अखबार की सुर्खियां दिखाई देती हैं, चैनलों की चमक दिखाई देती है, लेकिन कैमरे और कलम के पीछे संघर्ष करते पत्रकार की पीड़ा अक्सर अनदेखी रह जाती है।
आज डिजिटल युग में खबरों की रफ्तार बढ़ गई है। प्रतिस्पर्धा इतनी तीव्र हो गई है कि पत्रकार को चौबीसों घंटे सक्रिय रहना पड़ता है। सोशल मीडिया के दौर में सबसे पहले खबर देने की होड़ है, लेकिन इसके बावजूद छोटे शहरों और कस्बों में काम करने वाले अनेक पत्रकार आज भी सीमित संसाधनों और कम आय में अपना दायित्व निभा रहे हैं।
“भूखे भजन न होय गोपाला” — यह लोकोक्ति पत्रकारों पर भी उतनी ही लागू होती है। समाज से जुड़े मुद्दों को उठाने वाला पत्रकार भी आखिर एक इंसान है। उसके परिवार की जरूरतें हैं, बच्चों की पढ़ाई है, घर का खर्च है। यदि उसकी मूलभूत आवश्यकताएं ही पूरी न हों तो उससे निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता की अपेक्षा करना भी एक बड़ा प्रश्न है।
फिर भी पत्रकार अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटता। क्योंकि उसके लिए पत्रकारिता केवल रोजगार नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक दायित्व है। वह जानता है कि उसकी एक खबर किसी पीड़ित को न्याय दिला सकती है, किसी भ्रष्टाचार का पर्दाफाश कर सकती है और किसी प्रशासनिक लापरवाही को सुधार सकती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज पत्रकार की भूमिका को केवल खबरों तक सीमित न समझे, बल्कि उसके संघर्षों को भी पहचाने। आखिरकार, लोकतंत्र की मजबूती उसी कलम से है जो सच लिखने का साहस रखती है। लेकिन उस कलम को भी चलने के लिए स्याही के साथ-साथ “दो जून की रोटी” चाहिए।
क्योंकि सच लिखने वाला पेट से नहीं, जज्बे से लड़ता है; मगर जज्बा भी तब तक ही जिंदा रहता है, जब तक चूल्हे में आग जलती रहे।

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