मथुरा में शिव पार्वती लीला का हुआ मंचन

रिपोर्ट यज्ञदत्त चतुर्वेदी मथुरा

करेहु सदाशंकर पद पूजा । नारि धर्म पतिदेव न दूजा ।।

श्रीकृष्ण जन्मस्थान लीला मंच पर शिव-पार्वती विवाह का

मनोहारी व हृदयस्पर्शी मंचन हुआ,

इस अवसर पर श्रीकृष्ण जन्मस्थान के प्रांगण में शिव बारात निकाली गयी

देवर्षि नारद माता पार्वती के पिता हिमाचल के यहाँ ंपहुंचते हैं हिमाचल देवर्षि से पुत्री पार्वती की हस्तरेखा दिखाकर भविष्य बताने की प्रार्थना करते है । नारदजी ने सभी प्रकार से गुणवान, यशस्वी एवं अखण्ड सौभाग्यवती बताते हुये कहा कि आपकी पुत्री को सभी सुख है, केवल एक कमी बताई कि इसका पति अघोरी व अस्त-व्यस्त वस्त्र धारण करने वाला होगा । हिमाचल ने अपनी पुत्री के दोष को शांत करने का उपाय पूंछा तो नारदजी ने कहा कि इसका विवाह भूतभावन भगवान शिव से होगा । आप अपनी पुत्री से तप करायें इससे सभी दोष शांत होंगे ।

देवर्षिनारद के जाने के पश्चात् माता मैना ने ऐेसे वर से विवाह करने को मना किया तो हिमाचल राजा ने भगवान का स्मरण करने की सलाह दी । पार्वतीजी ने अपनी माता को बताया कि उन्होंने रात्रि में एक स्वप्न देखा कि एक बहुत सुन्दर श्रेष्ठ ब्राह्मण ने कहा कि नारदजी ने जो कुछ कहा है उसे सत्य मान कर तपस्या कीजिये । जिससे मेरे समस्त दुख-दोषों का नाश होगा ।

माता पिता की आज्ञा से उन्होंने कठिन तप किया । ब्रह्माजी ने प्रकट होकर शंकरजी को उनके वर के रूप में प्राप्त होने का वर प्रदान किया ।

शंकर भगवान समाधि में लीन थे तब भगवान नारायण ने प्रकट होकर उनसे पार्वती से विवाह करने की प्रार्थना की । उनके सुझाव पर भगवान शंकर ने सप्त ऋषियों को पार्वती जी की मनोइच्छा जानने को भेजा । जहा ऋषियों ने देवी पार्वती के सम्मुख श्री शंकरजी की अनेक बुराईयां एवं अवगुणों की व्याख्या की तो पार्वतीजी ने हॅस कर कहा कि भगवान शंकर ही मेरे स्वामी हैं, मेरा जीवन उनके लिए अर्पित है। अतः करोड़ों जन्मो शंकरजी की सेवा में रहूं ।

ऋषि शंकरजी से पार्वती की इच्छा प्रकट करते हैं ।

तारकासुर के भय से सभी देवता कामदेव को भगवान शंकर की समाधि भंग करने को भेजते हैं । यहा शिव कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से भस्म कर देते हैं ।

विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओं के अनुरोध पर शंकरजी दूल्हा का वेश धारण कर दिगपाल, भूत, प्रेत, पिशाच, व देवताओं के साथ बारात लेकर राजा हिमाचल के यहा पहुंचते हैं ।

श्रीकृष्ण जन्मस्थान प्रांगण में बैण्ड बाजों के मध्य शिव बारात निकाली गई । माता मैना वर एवं बरातियों का रूप देख कर भयभीत हो जाती हैं किन्तु पुत्री पार्वती द्वारा धैर्य धारण कराने पर वर का स्वागत करती हैं । उसके पश्चात् शिवजी का पार्वती के साथ पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न होता है ।

प्रसाद की व्यवस्था मध्याहं की राजकुमार सर्राफ आदित्य सर्राफ वृन्दावनवाले एवं रात्रि काल कि कृष्ण कुमार सर्राफ कन्नू द्वारा की गई ।

लीला में सभा के नीति निदेशक गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी, जन्मस्थान संस्थान के सचिव कपिल शर्मा, सभापति जयन्ती प्रसाद अग्रवाल, उपसभापति जुगलकिशोर अग्रवाल, महामन्त्री मूलचन्द गर्ग,मन्त्री प्रदीप सर्राफ पी.के., विजय सर्राफ किरोड़ी, कोषाध्यक्ष शैलेश अग्रवाल सर्राफ, आय-व्यय निरीक्षक अजय मास्टर, पं0 शशांक पाठक,सुरेन्द्र शर्मा खौना, विनोद सर्राफ, नगेन्द्र मोहन मित्तल, संजय बिजली, अनूप टैण्ट, अजय सर्राफ, वैभव अग्रवाल, मोहित अग्रवाल, रोहित चुनमुन, कौशल जिन्दल चरत लाल सर्राफ ,विवेक सूतिया ,अंकुर गर्ग ,सर्वेश शर्मा ,रोहित चुनमुन ,बबलू सजावट आदि प्रमुख थे ।

श्रृंगार व्यवस्था मे विष्णु शर्मा, रमेश किस्सो, नितिन शर्मा स्वरूपों का मनोहारी श्रृंगार प्रतिदिन कर रहे है ।

आज दि0 17 सितम्बर को सायं 7 बजे श्रीकृष्ण जन्मस्थान रंगमंच पर नारद मोह तथा रावण जन्म की लीला होगी ।

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