खुद को ईश्वर न समझ बनो भगवान के दास : विवेक शास्त्री

रविन्द्र शुक्ला उत्तरप्रदेश प्रभारी 

 

मनुष्य खुद को सर्वशक्तिमान समझने की बजाय प्रभु का दास बनने का प्रयास करें क्योंकि भक्त में भक्ति भाव देख कर जब प्रभु में वात्सल्य जागता है तो हमारे आराध्य अपनी भक्तरूपी संतान के पास दौड़े चले आते हैं । यह प्रवचन नैमिष के कथाव्यास विवेक भाई शास्त्री ने कथा के समापन दिवस पर कहे

नैमिष तीर्थ स्थित ललिता सदन में आठ दिवसीय भागवत कथा का समापन पूर्णाहुति एवं भंडारे के साथ हुआ । यह आयोजन मॉरीशस से पधारे पंडित नरेंद्र शर्मा रामचरण के द्वारा अपने माता पिता की पुण्य स्मृति में किया गया । श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के विश्राम दिवस पर कथाव्यास ने श्रीकृष्ण भक्त एवं बाल सखा सुदामा के चरित्र का वर्णन का वर्णन करते हुए सुदामा के आने की खबर पाकर किस प्रकार श्रीकृष्ण दौड़ते हुए दरवाजे तक गए थे। पानी परात को हाथ छूवो नाहीं, नैनन के जल से पग धोये । श्री कृष्ण अपने बाल सखा सुदामा की आवभगत में इतने मगन हो गए कि द्वारिकानाथ स्वयं हाथ जोड़कर और उन्हें अपने गले लगाकर जल भरे नेत्रों से सुदामा का हालचाल पूछने लगे। उन्होंने बताया कि इस प्रसंग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मित्रता में कभी धन दौलत आड़े नहीं आनी चाहिए।आज कथा के सातवें दिन की पूर्णता पर मुख्य यजमान नरेंद्र शर्मा रामवरण ने पत्नी यंदनी शर्मा व पुत्र गेहेश्वर शर्मा द्वारा भागवत भगवान की आरती उतारी गई।  इस अवसर पर महंत बिहारी लाल,  पुरुषोत्तम शास्त्री ,  धर्मेश दीक्षित सहित बड़ी संख्या में भक्तों ने भागवत कथा सुन प्रसाद ग्रहण किया।

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